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गायों की विशेषता से अवगत कराता है पंचगव्य | Panchagavya Benefits

30 Mar, 2024 8
पंचगव्य|

पंचगव्य (Panchagavya ) देसी गाय से प्राप्त पांच चीजों का समूह है। इसमें गोदुग्ध (दूध), गोदधी (दही-छाछ), गोमयम् (गोबर), गोघृत (घी) व गोमूत्र (मूत्र) शामिल हैं।

गाय को हमारे देश में माता का दर्जा दिया है। प्राचीन ऋषि मुनियों के अलावा चिकित्सकों ने भी गाय को प्रमुखता दी है। वेदों, ग्रंथो के अलावा वैज्ञानिकों ने भी गाय के दूध घी के अलावा गोबर व गौमूत्रों को विशेष औषधियों में शामिल किया है। सबसे प्रमुख विशेषता तो पंचगव्य की मानी गई है।

पंचगव्य मानव, पशु, कृषि और मिट्टी के स्वास्थ्य के उपचारात्मक कार्रवाई में एक निवारक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करता है। पंचगव्य का प्रभाव उसके निर्माण में प्रयोग की जाने वाली सामग्री, उत्पादन पद्धति तथा भंडारण पर काफी निर्भर करता है। इसके निर्माण में प्रयोग की जाने वाली सामग्री दूध, दही, घी, गोमयम्  तथा गो मूत्र भारतीय गो-वंश से लिया जाता है।

पंचगव्य की गुणवत्ता इन सामाग्रियों में पाये जाने वाले लाभदायक रोगाणुओं, माइक्रोबस एवं अर्क पर निर्भर करता है। इन उत्पादों की शुद्धता और बेहतर गुणवत्ता इनके स्रोतों और साथ ही इन संसाधनों के उचित प्रबंधन पर निर्भर करता है। पंचगव्य के स्रोत व्यावहारिक रूप से भारतीय गायों की सभी नस्लों से लिए जाते हैं। पंचगव्य के लिए कच्चा माल भारतीय देशी गायों से प्राप्त किया जाता है। उनकी गुणवत्ता और शुद्धता नीचे दिये गये सूचीबद्ध कारकों पर निर्भर करती है।

 ये कारक कच्चे माल(गाय के पांचों गव्य) पर उल्लेखनीय प्रभाव डालते हैं और उसके बाद पंचगव्य पर, जो उन पदार्थों से बनाया जाता है। सर्वोत्तम गुणवत्ता के लिए नीचे कई कारकों को विस्तार से वर्णित किया है जिस पर दृष्टि डालना महत्वपूर्ण है।

गायों की विशेष नस्लों की अलग-अलग विशेषताएं भी हैं जो इस प्रकार हैं

 भारतीय नस्ल की गाय- यह सभी जानते हैं कि शुद्ध पंचगव्य के निर्माण में केवल और केवल भारतीय देसी नस्लों की गायों का विशेष योगदान होता है। हालांकि सभी देशी नस्ल की गायों को सभी उत्पादों के लिए सर्वोत्तम नहीं माना जा सकता है।  उदाहरण के तौर पर साहिवाल, लाल सिंधी, और गीर जैसी गाय दूध-दही तथा इससे संबन्धित उत्पादों के लिए सर्वोत्तम होती है। दूसरी तरफ वैचूर तथा लाल बिलाही,बद्री नस्ल (हिमालय प्रदेश की गाय) की गायों का गौमूत्र और गोबर सबसे सर्वोत्तम होता है। खुले वातावरण में चराई के साथ स्थानीय शुद्ध नस्ल की गायें बेहतर प्रबंधन के साथ गुणवत्ता उत्पादन के लिए सबसे अच्छी मानी जाती हैं।

 खानपान - गायों का खाद्य-मुक्त वातावरण में हरी-भरी घास चरने से इनसे निकलने वाले दूध और अन्य सामाग्रियों पर काफी प्रभाव पड़ता है।

 खुले मैदान जंगलों पहाड़ों में गायों को उनके मन मुताबिक भोजन मिलता है, क्योंकि रसायन-युक्त भोजन से गायों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

वातावरण- गायों को संकीर्ण क्षेत्र में रखने से उन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

यही नहीं, गायों को खुले मैदान में ताजी घास चरने के लिए छोड़ देना चाहिये। मुख्यतः गायों को घास वाले मैदान में रखना ही सर्वोत्तम होता है।

प्रबंधन अभ्यास - सही समय पर गाय को ताजा भोजन खिलाने तथा देखभाल करने से गाय के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

स्वास्थ्य की देखभाल - स्वस्थ गाय से उच्च कोटी का उत्पाद पाया जा सकता है।  गाय को प्राकृतिक एवं आयुर्वेदिक उपचार देने से कछ चुने हुए क्षेत्रों में पंचगव्य पर बुरा प्रभाव नहीं पड़ता हैं और इसमें अधिक खर्च भी नहीं आता है। इस प्रकार स्वास्थ्य की देखभाल करने से गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

व्यक्तिगत देखभाल और चेतना - प्रत्येक प्राणी को व्यक्तिगत देखभाल और मित्रता की आवश्यकता होती है। और इस प्रकार की बांडिंग जानवर और उसकी देखभाल करने वाले के बीच एक प्रसन्नता का भाव बनाए रखती है। इस प्रकार की चेतना को बढ़ावा देना चाहिये,

 क्योंकि यह गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्य के लिए लाभकारी होता है। इस प्रकार के कारक हमारी भारतीय देशी नस्ल की गायों के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं।

पंचगव्य को प्रभावित करने वाले तत्व - पंचगव्य को कई तत्व प्रभावित करते हैं।

 पंचगव्य की अवधारणा संस्कृत शब्द से हुई है, जो 'काउपैथी' शब्द को निर्दिष्ट करती है। 'काउपैथी आयुर्वेदिक दवा का ही एक शाखा होती है।

आयुर्वेदिक औषधि जैसे कपिलू मुख्यतः गुंजा के निर्माण में अन्य तत्वों को मिलाने के पश्चात इसके शुद्धिकरण के लिए पंचगव्य और गो-मूत्र का प्रयोग किया जाता है।

 इसी तरह गोम्य मिट्टी, पर्यावरण विकिरण से भी बचाव करता है। गाय का दूध, घी और दही मानव स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होने के लिए जाना जाता है। भारतीय स्वदेशी नस्लें पंचगव्य की गुणवत्ता को प्रभावित करने में प्राथमिक कारक होती हैं। इसका प्राथमिक आधार भारत की स्थानीय नस्ल की गायों से ऐतिहासिक रूप से विकसित किया गया है।

इन उत्पादों की सबसे अच्छी गुणवत्ता हमेशा देशी भारतीय नस्ल की गायों से प्राप्त होती रही है। एनजीआरबी, करनाल, के सर्वे के अनुसार कुल 41 ऐसे गो-वंश है जिनका इस्तेमाल दूध प्राप्ती एवं खेतों में किया जाता है। इन गायों की अपनी एक अलग ही विशेषता है।

वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध की गई पंचगव्य की उपयोगिता

गोम्या, गो-मूत्र व दूध सहित उनके कुबड़, गल कम्बल और सुर्यकेतु नाड़ी आदि जैसे अंग भी  भारतीय स्वदेशी गौवंश में बिल्कुल अलग होते हैं। भारतीय स्वदेशी गायों से प्राप्त होने वाले दूध और पंचगव्य की उपयोगिता को वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध किया गया है। इन विभिन्न प्रकार की भारतीय देशी नस्लों वाली गायों में कई प्रकार की विविधताएं पायी जाती हैं, जो सभी को ज्ञात है। और ये विविधता सभी में एक दूसरे से भिन्न होती हैं। अतः सर्वोत्तम प्रकार का पंचगव्य केवल देशी नस्ल की गायों से ही संभव है।

भोजन और खिलाने की आदत : गायों द्वारा रासायनिक खाद्य-मुक्त वातावरण में हरी-भरी घास चरने से इनसे निकलने वाले दूध और अन्य सामाग्रियों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि खुले मैदान में गायों को उनके मनमुताबिक भोजन मिलता है।

रसायन-युक्त भोजन  गायों पर बुरा प्रभाव डालता है। चारागाह में रहने वाले जानवर कई सारे लाभकारी पोषण प्राप्त करते हैं।

 100 प्रतिशत घास खाने वाली गायों के विपरीत, चारागाह में वाली गायों को चराई के मौसम और सर्दियों के महीनों मे प्राप्त होने वाले पूरक जैविक खाद्य प्राप्त होते हैं।

प्रत्येक गाय को कम से कम 120 दिन के लिए चारागाह वाले खुले क्षेत्र में छोड़ा जाना चाहिये। हां मौसम को देखते हुए और दूध निकालने के लिए उन्हें बंद स्थान पर अवश्य लाया जाना चाहिये। मकई, सोया, जई, जौ, ज्वार, बाजरा और अन्य छोटे अनाज जानवरों को आवश्यक खनिज पूरक प्रदान करते हैं। गायों को कभी-कभी गैर-आयोडीन युक्त नमक से भी लाभकारी पोषक तत्व मिलते है, जो कहीं न कही इनसे प्राप्त होने वाले पंचगव्य को प्रभावित करते हैं। चारागाह वाली गायें न केवल उत्तम कोटी का दूध देती हैं, बल्कि उनका गो-मूत्र और गोबर भी काफी उत्तम होता है। खुले में चरने वाली गायों से प्राप्त हाने वाले दूध में ढ़ाई गुणा ओमेगा फैट, 'बेटा कैरोटीन,' 'विटामिन ई.' और 'सीएलए' होता है।

वातावरण : गायों को खुले स्थानों पर रखना ही सर्वोत्तम होता है, क्योंकि ये उनकी आवश्यकता भी होती है। आकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नियोजित खुली डेयरी परियोजनाएं गायों के जीवन को खुशहाल और स्वस्थ बनाती हैं। गायों को संकीर्ण क्षेत्र में रखने से उन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। गायों को खुले मैदान में ताजी घास चरने के लिए छोड़ देना चाहिये। मुख्यतः गायों को घास वाले मैदान में रखना ही सर्वोत्तम होता है।

प्रबंधन अभ्यास : जब से जानवरों के पालन-पोषण की व्यवस्था बनी तब से पशुपालन एक व्यवस्थित प्रणाली बन चुकी है। पारंपरिक पालन-पोषण करने की विधि समय के साथ आधुनिक होती गई है। सही समय पर गाय को ताजा भोजन खिलाने तथा देखभाल करने से गाय के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

स्वास्थ्य : आयुर्वेद एवं उसके संदर्भों का गाय की चिकित्सा में प्रयोग करने से पंचगव्य पर काफी सकारात्मक प्रभाव छोड़ता है। जानवरों को सोच-समझकर दवा दी जानी चाहिये। हालांकि देशी नस्ल की गायों में रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी अधिक होता है। मुख्यतः गायों को नीम, तुलसी, अश्वगंधा, गीलोय, सतावरी आदि जैसी प्राकृतिक दवाएं देनी चाहिए। क्योंकि प्राकृतिक दवाओं से ये हमेशा स्वस्थ रहती हैं। इस प्रकार के स्वास्थ्य देखभाल करने तथा आयुर्वेदिक दवा देने से गाय से प्रप्त होने वाला पंचगव्य भी लाभकारी होता है।

गोधन अर्क के फायदे, नुकसान

व्यक्तिगत देखभाल और चेतना : मानवता को समाज के अनुसार परिभाषित किया गया है। हम मनुष्य एक-दूसरे के बीच पहचान कर सकते हैं और ऐसे संघ बना सकते हैं जो गहरे और सार्वकालिक हों। यही परिभाषा जानवरों के ऊपर भी लागू होती है। प्रत्येक जानवर को व्यक्तिगत देखभाल और मित्रता की आवश्यकता होती है, क्योंकि यदि जानवर और इसको देखभाल करने वाला व्यक्ति दोनों प्रसन्न रहते हों तो इससे जानवरों का जीवन भी स्वावलम्बी होता है। इस प्रकार की चेतना को बढ़ावा देना चाहिये, क्योंकि यह गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्य पर असर करता है। इस प्रकार की नियमावली हमारे भारतीय देशी नस्ल की गायों के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है।

निष्कर्ष : इस पूरे प्रकरण में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उपरोक्त लाईनों में कुछ चर्चाएं की गई है जो गाय से निकलने वाले पंचगव्य को प्रभावित करती हैं।  सबसे सर्वोत्तम दूध उन देशी नस्ल की गायों से प्राप्त होता है, जो पारम्परिक खुले चारागाह में रहती हैं। यह पंचगव्य प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवी अर्क और पोषक तत्वों से भरपूर होता है जो आगे के उपयोगों के लिए अधिक फायदेमंद होता है। गाय से प्राप्त होने वाले पंचगव्य से मानव स्वास्थ्य, मिट्टी स्वास्थ्य और पर्यावरण के क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न किये जाने की काफी संभावनाएं है। पंचगव्य मिट्टी, जल, वायु, आकाश और अग्नि जैसे पांचों तत्वों का शुद्धिकरण करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और यह युवाओं को रोजगार मुहैया कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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